त्रिवेणी संगम प्रयागराज: तीर्थराज का रहस्य, तीन नदियों का मिलन और स्नान का पुण्य
“जानिए गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन संगम का आध्यात्मिक रहस्य — क्यों संगम में एक डुबकी लगाने से जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं।”

सनातन धर्म और वैदिक वांग्मय में प्रयागराज को "तीर्थराज" यानी समस्त तीर्थों का अधिपति और सम्राट कहा गया है। इस पावन नगरी की आत्मा है — "त्रिवेणी संगम", जहाँ तीन पवित्रतम नदियों का मिलन होता है: मोक्षदायिनी भागीरथी गंगा, सूर्यतनया श्यामल यमुना और अंतःसलिला ज्ञानदायिनी माँ सरस्वती।
वेदों और पुराणों में तीर्थराज का महत्व मत्स्य पुराण, पद्म पुराण और महाभारत में उल्लेख आता है कि संसार के सभी तीर्थों का पुण्य एक तरफ और तीर्थराज प्रयाग में त्रिवेणी संगम का पुण्य एक तरफ। महर्षि वेदव्यास जी लिखते हैं कि माघ मास में त्रिवेणी में केवल तीन दिन का प्रातः स्नान भी व्यक्ति को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर वैकुंठ धाम का अधिकारी बना देता है।
ऋग्वेद के परिशिष्ट मंत्रों में स्पष्ट उद्घोष है — "जहाँ दो महान नदियाँ (गंगा-यमुना) आपस में मिलती हैं, वहाँ स्नान करने वाले पुण्यात्मा दिव्य लोकों को प्राप्त होते हैं।"
आँखों के सामने दो धाराओं का प्रत्यक्ष दर्शन त्रिवेणी संगम की सबसे चमत्कारी विशेषता यह है कि यहाँ गंगा और यमुना की धाराएँ अपने अलग-अलग रंगों से साफ पहचानी जाती हैं। नौका द्वारा जब आप संगम बिंदु पर पहुँचते हैं, तो एक तरफ मटमैले-श्वेत रंग में वेग से बहती माँ गंगा की धारा दिखती है, और दूसरी तरफ गहरे नीले-हरे (श्यामल) शांत जल वाली कालिंदी (यमुना) की धारा मिलती है। दोनों का यह पावन मिलन हृदय में असीम शांति और भक्ति का संचार करता है।
संगम पर किए जाने वाले प्रमुख अनुष्ठान 1. **त्रिवेणी स्नान व सूर्य अर्घ्य**: संगम की पावन धारा में तीन डुबकी लगाकर भगवान भास्कर को तांबे के लोटे से जल अर्पित करना और पितरों का तर्पण करना। 2. **वेणी दान**: सौभाग्यवती स्त्रियों द्वारा अपने सुहाग की दीर्घायु और कुल की मंगल कामना हेतु संगम में वेणी (केश का एक सूक्ष्म भाग) समर्पित करने की प्राचीन सनातन परंपरा। 3. **संध्या दीपदान**: गोधूलि वेला में संगम की लहरों पर गेंदे के फूलों से सजे मिट्टी के दीयों को प्रवाहित करना, जिससे पूरी नदी स्वर्ण ज्योति से जगमगा उठती है। 4. **लेटे हुए हनुमान जी के दर्शन**: संगम स्नान के पश्चात बंधवा स्थित श्री बड़े हनुमान जी के दर्शन करना अनिवार्य नियम है, जिसके बिना संगम स्नान का फल अधूरा माना जाता है।
संगम यात्रा का सर्वोत्तम समय यद्यपि संगम प्रतिदिन पावन है, परंतु निम्नलिखित अवसरों पर यहाँ का आध्यात्मिक प्रभाव चरम पर होता है: - **माघ मेला (जनवरी–फरवरी)**: 45 दिनों का कल्पवास, जिसमें देश-विदेश से आए लाखों कल्पवासी संगम तट पर कुटिया बनाकर सात्विक साधना करते हैं। - **मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या और वसंत पंचमी**: संगम स्नान के महापुण्यकारी दिवस जब करोड़ों श्रद्धालु अमृत स्नान करते हैं। - **महाकुंभ पर्व**: विश्व का सबसे बड़ा आध्यात्मिक समागम, जहाँ संत-महात्माओं और नागा संन्यासियों के अमृत स्नान के दर्शन होते हैं।
लेखक
आचार्य विद्याधर शास्त्री
श्री बड़े हनुमान मंदिर एवं तीर्थराज प्रयाग सनातन शोध मंडल
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